🔹तआर्रुफ़:
“सुकून-ए-शहर” एक रूहानी ग़ज़ल है जो इंसानियत, मोहब्बत और अमन का पैग़ाम देती है। इसमें कवि ने समाज में फैलती नफ़रत, ज़ुल्म और बेज़ारी के बीच इंसानी हक़ीक़त की तलाश की है। हर शेर में एक उम्मीद, एक आवाज़ और एक दुआ छिपी है — कि जहाँ अंधेरा है वहाँ उजाले का इंतज़ाम हो, जहाँ नफ़रत है वहाँ सलाम हो। यह ग़ज़ल सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं बल्कि एक दुआ है उस समाज के लिए जो मोहब्बत और एहतराम से जिए। “क़बीर” की आवाज़ इस ग़ज़ल में इंसानियत की शमअ जलाती है, जो हर दिल में रौशनी और अमन की लौ जगाती है।
ग़ज़ल:सुकून-ए-शहर
मतला
हर एक दिल में मोहब्बत का एहतिराम भी हो,
अगर हो नफ़रत कहीं, तो वहाँ सलाम भी हो।
जहाँ पे ज़ुल्म दिखे, बोलने की हिम्मत रहे,
दिलों में डर न रहे, कुछ एहतिमाम भी हो।
ग़रीब बच्चे जो सपनों में ढूँढते हैं सवेरा,
उन्हें हक़ीक़त में सूरज का पैग़ाम भी हो।
क़लम चले तो अदब में हो नर्मी का एहसास,
अगर बयान में तेवर हों, एहतिराम भी हो।
जो आँसुओं में भी सच्चाई ढूँढ लेते हैं,
उनकी नज़रों में हक़ का सलाम भी हो।
सफ़र में ठोकरें मिलें तो हौसले ना मरें,
हर गिरने वाले के साथ कोई पयाम भी हो।
मुहब्बतों का असर कुछ यूँ दिखे हर सू,
कि दिल में खल्क़ के लिए एहतेराम भी हो।
जहाँ पे तालीम हो, वहीं तर्बियत भी रहे,
क़लम के साथ अदब का एहतराम भी हो।
जहाँ पे नफ़रत की दीवारें उठी हों सख़्त,
वहाँ पे फिर से मोहब्बत का इंतेज़ाम भी हो।
जहाँ पे आँसुओं से लबरेज़ हैं आँखें सब,
वहाँ दुआओं का सिलसिला क़याम भी हो।
जो झूठ बोलते हैं सच्चाई के लिबास में,
उन्हें दिखा दे कोई आईना-ए-कलाम भी हो।
जहाँ पे भड़क उठे आग नफ़रतों की कभी,
वहाँ पे अश्कों से बुझने का इंतज़ाम भी हो।
मक़ता
“क़बीर” बोल उठा जब हुआ अंधेरा बहुत,
हर एक घर में उजाले का इंतेज़ाम भी हो।
🔹ख़ातिमा:
इस ग़ज़ल का हर शेर एक आइना है जो इंसान को खुद से रूबरू कराता है। “सुकून-ए-शहर” का पैग़ाम यही है कि जब दिलों में मोहब्बत होगी, तब ही शहर में सुकून होगा। क़लम से लेकर दिल तक, हर जगह एहतराम, अदब और रहमत का रंग होना चाहिए। “क़बीर” की ये पुकार उस समाज के लिए है जहाँ इंसानियत को ज़िंदा रखना सबसे बड़ा जिहाद है। यह ग़ज़ल सिर्फ़ तसव्वुर नहीं, बल्कि एक तहरीक है — अमन, इत्तेहाद और इंसानी सलीके की। अगर हर घर में उजाले का इंतज़ाम हो जाए, तो शायद ये दुनिया फिर से जन्नत बन सके।
उर्दू शब्दों के आसान हिन्दी मतलब:
