‘वक़्फ़ का सवाल’: एक दास्तान-ए-हयात
‘‘वक़्फ़ का सवाल’ एक ऐसे गहरे मामले को जन्म देता है जो मात्र धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व तक सीमित नहीं, बल्कि समाज और सियासत के पेचीदा रिश्तों को भी बेनक़ाब…
‘‘वक़्फ़ का सवाल’ एक ऐसे गहरे मामले को जन्म देता है जो मात्र धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व तक सीमित नहीं, बल्कि समाज और सियासत के पेचीदा रिश्तों को भी बेनक़ाब…
“बिखरे ख़्वाब, जलते सवाल” एक दिल से निकली हुई शेरों की कश्ती है, जो ज़िंदगी के समंदर में बहते दर्द, मोहब्बत, तन्हाई, और रिश्तों की हक़ीक़त को अपनी हर मौज…
यह ग़ज़ल “पंचर वाले” उन्हीं शख़्सीयतों का एहतराम करती है, जिन्होंने अपनी मेहनत और कुर्बानियों से अंधेरों में रोशनी पैदा की। हमारे समाज में ऐसे बे़शुमार लोग हैं जिन्होंने अपनी…
Author: “क़बीर ख़ान” Date: “2025-04-25” मोहब्बत और ज़िंदगी: एक ग़ज़ल की तहरीर मोहब्बत की ताज़गी लाज़िम है ज़िंदगी के लिए, मगर चंद सिक्कों की गर्मी भी है रवानगी के लिए।…
ज़ुल्म की वीरानी पर ग़ज़ल – ग़ज़ल: “ज़ुल्म की वीरानी को ग़म-ए-दिलख्वे ना दे” ज़न्नत-ए-कश्मीर को ज़ुल्म-ए-सियाह का सितम-ए-सहे ना दे, बेगुनाहों के ख़ून से फ़र्द-ए-ख़ुदा को ग़म-ए-दिलख्वे ना दे।…
फ़िलस्तीन के दर्द पर ग़ज़ल “मैं फ़िलस्तीन हूँ” यह मेरी ज़मीन है, यह मेरी ज़मीन है,हर दर्द की कहानी, मैं फ़िलस्तीन हूँ। मैं फ़िलस्तीन हूँ, मैं फ़िलस्तीन हूँ।” नक़्शे में…
तआऱुफ़ (Introduction) : वक़्फ़ एक ऐसा निज़ाम है जो सदीयों से मुस्लिम समाज में मआशी (आर्थिक) और समाजी (सामाजिक) फ़लाह-ओ-बहबूदी के लिए बुनियादी किरदार अदा करता चला आ रहा है।…
ग़ज़ल — ग़ुल्फ़िशां के नाम ग़ुल्फ़िशां की सदा को कैद कर बैठे हैं लोग, हक़ की आवाज़ को बग़ावत समझ बैठे हैं लोग। -1 वो जो ज़ुल्मों से लड़ी, सब्र…
Author: Er. Kabir Khan B.E.(Civil Engg.) LLB, LLM परिचय: ‘जादुई अल्फाज़’ वे लफ़्ज़ (शब्द) हैं जो किसी की सोच, एहसास (भावना), या रवैया (व्यवहार) को बदलने की सलाहियत (क्षमता) रखते…
Introduction उर्दू अल्फ़ाज़ (शब्द) सिर्फ़ गुफ़्तगू (बातचीत) का एक ज़रिया नहीं, बल्कि हमारी तहज़ीब (संस्कृति) और शख़्सियत (व्यक्तित्व) की झलक भी पेश करते हैं। जब लफ़्ज़ (शब्द) नफ़ासत (शालीनता) और…