“क़ुर्बानी-ए-हक़”: एक ग़ज़ल
तआर्रुफ़ ग़ज़ल “क़ुर्बानी-ए-हक़” क़ुर्बानी के असल मतलब को बयाँ करती है, जो सिर्फ़ जान देने तक सीमित नहीं। ये दिल के नफ़्स और शैताँ से लड़ने की बात करती है। शायर…
तआर्रुफ़ ग़ज़ल “क़ुर्बानी-ए-हक़” क़ुर्बानी के असल मतलब को बयाँ करती है, जो सिर्फ़ जान देने तक सीमित नहीं। ये दिल के नफ़्स और शैताँ से लड़ने की बात करती है। शायर…
ग़ज़ल ‘जंग-ए-हक़’ एक इंक़लाबी पैग़ाम है, जो ज़ुल्म, तसद्दुद और जाबिर हाकिमों के ख़िलाफ़ उठती हुई एक बुलंद आवाज़ है। इस ग़ज़ल में शायर ने हक़ और इंसाफ़ के लिए…