तन्हाई-ए-ख़्वाब: एक ग़ज़ल

🌙 तआर्रुफ़: यह ग़ज़ल उन ख़्वाबों की शिनाख़्त है जो कभी पलकों में जज़्ब हुए मगर हक़ीक़त का चोला पहनने से महरूम रह गए। हर शेर, नफ़्सानी जज़्बात की एक…

ज़बान-ए-ग़म: एक ग़ज़ल

🖋️ तआर्रुफ़ (Introduction) : “ज़बान-ए-ग़म” एक रूहानी ग़ज़ल है जो टूटे दिल की ख़ामोश चीख़ों को लफ़्ज़ों में ढालती है। इस ग़ज़ल में उन लोगों से सवाल किया गया है…

ख़ुशबू-ए-मोहब्बत की कमी: एक ग़ज़ल

🟢 तआर्रुफ़: “ख़ुशबू-ए-मोहब्बत की कमी” एक दिल को छू लेने वाली ग़ज़ल है जो आज के दौर की मोहब्बत की बदलती फितरत और इंसानी रिश्तों की गिरती शराफ़त पर गहरा…