ज़ंजीरों का सब्र: एक ग़ज़ल

इस ग़ज़ल ‘ज़ंजीरों का सब्र’ में बग़ावत की रूह, इंसाफ़ की आरज़ू, और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ हौसले की आग शामिल है। यह उन तमाम आवाज़ों का मंज़र-ए-अमल है जो सदियों…

जंग-ए-हक़: एक ग़ज़ल

ग़ज़ल ‘जंग-ए-हक़’ एक इंक़लाबी पैग़ाम है, जो ज़ुल्म, तसद्दुद और जाबिर हाकिमों के ख़िलाफ़ उठती हुई एक बुलंद आवाज़ है। इस ग़ज़ल में शायर ने हक़ और इंसाफ़ के लिए…

ज़ुल्म की वीरानी

ज़ुल्म की वीरानी पर ग़ज़ल – ग़ज़ल: “ज़ुल्म की वीरानी को ग़म-ए-दिलख्वे ना दे” ज़न्नत-ए-कश्मीर को ज़ुल्म-ए-सियाह का सितम-ए-सहे ना दे, बेगुनाहों के ख़ून से फ़र्द-ए-ख़ुदा को ग़म-ए-दिलख्वे ना दे।…