“ख़ामोशियाँ बोलती हैं”:एक ग़ज़ल

“ख़ामोशियाँ बोलती हैं” एक ऐसी ग़ज़ल है जो लफ़्ज़ों के शोर में नहीं, बल्कि जज़्बात की तन्हा गलियों में साँस लेती है। ये उन लम्हों का तर्जुमान है जहाँ अल्फ़ाज़…

फ़िलस्तीन के दर्द पर ग़ज़ल “मैं फ़िलस्तीन हूँ”

फ़िलस्तीन के दर्द पर ग़ज़ल “मैं फ़िलस्तीन हूँ” यह मेरी ज़मीन है, यह मेरी ज़मीन है,हर दर्द की कहानी, मैं फ़िलस्तीन हूँ। मैं फ़िलस्तीन हूँ, मैं फ़िलस्तीन हूँ।” नक़्शे में…