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तआर्रुफ़:

“ग़ज़ल: ग़म-ए-जानाँ” मोहब्बत और जुदाई की तसवीर है। इसमें दिल की तड़प, यादों की महक और तन्हाई की तल्ख़ियाँ बड़ी नफ़ासत से बयान की गई हैं। हर शेर में इश्क़ का असर और ग़म का साया महसूस होता है। शायर ने चाहत के रंग और बिछड़ने की पीड़ा को इस अंदाज़ में पिरोया है कि रूह तक को छू जाए। इसमें मोहब्बत की ख़ामोशी भी है और इंकार का ज़ख़्म भी। जज़्बात की गहराई और अल्फ़ाज़ की सादगी इस ग़ज़ल को ख़ास बनाती है।

ग़ज़ल: ग़म-ए-जानाँ

मतला

तेरी यादों के ज़ख़्म अब तलक ताज़ा हैं,
दिल की दीवार पे ख़ामोशी का साया है।

तेरे अहसास की ख़ुशबू से महकता हूँ,
मेरे तनहा लम्हों में तेरा ही नूर छाया है।

तेरे नक़्श-ए-कदम दिल में उभर आते हैं,
मेरी आँखों में तेरा नाम ही समाया है।

तेरे अश्कों ने ही सींचा मेरी चाहत को,
तेरे लहजे ने ही उल्फत का पता पाया है।

तेरी बातें अभी भी रूह को छू जातीं,
तेरी आवाज़ में इक जादुई सराया है।

तेरे आँचल की पनाहों में सुकूँ मिलता था,
अब तो तन्हाई ने हर शय को मिटाया है।

तेरे पहलू से जो उठकर मैं जुदा हुआ हूँ,
मेरे होंठों पे तबस्सुम भी रूठ आया है।

तेरे रूठे हुए लहजे से डरा रहता हूँ,
तेरी खामोश निगाहों ने रुलाया है।

तेरे जाने से ही वीरान हुई ये दुनिया,
तेरी मौजूदगी में हर पल ने सजाया है।

तेरे अहद-ए-वफ़ा ने तो सँभाला मुझको,
तेरे इंकार ने हर ख़्वाब को रुलाया है।

तेरी ख़ामोश मोहब्बत भी तसल्ली देती,
तेरे इंकार ने मुझको तन्हा बनाया है।

तेरी ख़ामोश मोहब्बत भी तसल्ली देती,
तेरे इंकार ने मुझको तन्हा बनाया है।

मक़ता

कबीर अश्कों में डूबा हुआ जीता है अभी,
उसकी शायरी पे तेरी याद का साया है।

ख़ातमा:

“ग़ज़ल: ग़म-ए-जानाँ” का हर शेर मोहब्बत के दर्द और वफ़ा की याद को ताज़ा कर देता है। शायर ने अपनी तन्हाई, आँसू और टूटे ख़्वाबों को अशआर में ढालकर रूह की सच्चाई बयान की है। इसमें चाहत की ख़ुशबू भी है और जुदाई की वीरानी भी। मक़ते में शायर “कबीर” ने अपने दिल का दर्द यूँ बयाँ किया है कि उसकी शायरी पर सिर्फ़ यादों का साया महसूस होता है। यह ग़ज़ल मोहब्बत करने वालों के दिल को छू जाती है और हर उस रूह को राहत देती है जिसने जुदाई का दर्द झेला है।

उर्दू अल्फ़ाज़ के आसान हिन्दी मायने:

अहसास = महसूस करना, नक़्श-ए-कदम = पैरों के निशान/राह, उल्फ़त = मोहब्बत/प्यार, सराया = ठहरने की जगह, पनाह = सहारा/आश्रय, शय = वस्तु/चीज़, तबस्सुम = मुस्कान, अहद-ए-वफ़ा = वफ़ादारी का वादा, इंकार = मना करना/नकारना, तसल्ली = सुकून/ढाँढस, तन्हा = अकेला, अश्क़ = आँसू, ग़म = दुख, साया = छाया/परछाईं, रूह = आत्मा/दिल की गहराई, ख़ामोशी = चुप्पी, मौजूदगी = उपस्थिति/हाज़िरी, वीरान = सुनसान/उजड़ा, ज़ख़्म = घाव, नफ़ासत = नज़ाकत/कोमलता