तआर्रुफ़:
“ग़ज़ल- तूफ़ानों से आगे” इंसान की हिम्मत, हौसले और मेहनत की ताक़त का एक शानदार बयान है। इसमें शायर ने यह पैग़ाम दिया है कि ज़िंदगी की जंग में जीत उन लोगों की होती है जो पुख़्ता इरादों और बेख़ौफ़ अमल से आगे बढ़ते हैं। हालात के तूफ़ान, अंधेरे और साज़िशें इंसान का रास्ता नहीं रोक सकते, बल्कि उसकी मेहनत, तदबीर और सच्चाई उसे मंज़िल तक पहुँचाती है। यह ग़ज़ल इंसान को निराशा से निकालकर उम्मीद की रौशनी देती है और बताती है कि मुक़द्दर वही लिखता है जो ख़ुद को आज़माने का साहस रखता है। “कबीर” ने बड़े ख़ूबसूरत अंदाज़ में यह हक़ीक़त बयाँ की है कि दुनिया को जीतने का राज़ मेहनत, इख़लास और हिम्मत में छुपा है।
ग़ज़ल- तूफ़ानों से आगे
मतला
पुख़्ता इरादे, अमल बेख़ौफ़, मोहब्बत हो सरताज,
जंग-ए-हयात में कामयाबी का बस यही है राज़।
जो दिल में घर करे हिम्मत, वही हाकिम बने कल का,
न गर्दिश रोक सकती है, न थक सकती हैं तदबीरें।
नज़र में बेख़ुदी रखकर, जो आगे बढ़ गए आगे,
उन्हीं के हौसलों की बन गई तारीख़ में तहरीरें।
अंधेरे राह रोकें तो चिराग़-ए-दिल जलाना तुम,
हवा की साज़िशों से कब बुझी हैं शोला तक़दीरें।
ख़ुदा से माँग मत मंज़िल, क़दम आगे बढ़ा पहले,
ज़माना भूल जाता है मगर रहती हैं तदबीरें।
मुक़द्दर खुद लिखेगा वो, जो ख़ुद को आज़माएगा,
गिरेंगी साज़िशें सारी, चमक जाएँगी तक़दीरें।
मुसाफ़िर को भरोसा हो अगर अपनी उड़ानों पर,
तो फिर तूफ़ान क्या, रोकें न बिखरीं ये ज़ंजीरें।
जो अपने लहजे में रखे अदब की सादगी हरदम,
कभी जंगों से जीतेंगे, कभी महफ़िल में तासीरें।
अगर इख़लास हो दिल में, तो पत्थर भी पिघल जाएँ,
दुआओं से मिलेंगी फिर नई राहों की जागीरें।
रखो सर पर तजुर्बों का वो साया जो बचा लेगा,
कि सूरज देख कर भी थम नहीं सकती हैं तदबीरें।
जो अपने दर्द को मेहनत में ढालेगा, वही जीते,
मिटेगी गर्दिशें सारी, बदल जाएँगी तक़दीरें।
मक़ता
“कबीर” अपने इरादों से जहाँ को जीत ले जाना,
ये मिट्टी के खिलौने क्या, ये ताज़ और ये तस्ख़ीरें।
ख़ातिमा:
इस ग़ज़ल का हर शेर हौसले और इरादे का आईना है। इसमें यह सबक़ दिया गया है कि इंसान अगर अपने दर्द को मेहनत में ढाल दे तो तक़दीर बदल सकती है। अंधेरों को चिराग़-ए-दिल से रोशन करना और तूफ़ानों से बेख़ौफ़ आगे बढ़ना ही कामयाबी की पहचान है। शायर ने यह भी जताया है कि जो इंसान अपनी उड़ानों पर भरोसा रखता है, उसके रास्ते की कोई ज़ंजीर टूटने से नहीं बच सकती। “कबीर” का मक़ता ग़ज़ल का निचोड़ है, जो बताता है कि मिट्टी के खिलौने और ताज-ओ-तस्ख़ीरें सब फ़ानी हैं, असल कामयाबी इंसान के इरादों और जज़्बे में छुपी है। यह ग़ज़ल हर क़दम पर इंसान को ताज़गी, हिम्मत और उम्मीद से भर देती है।
मुश्किल उर्दू अल्फ़ाज़ का हिंदी मेंअर्थ:
पुख़्ता – मजबूत, इरादे – नीयत, अमल – काम, बेख़ौफ़ – निडर, सरताज – ताज, जंग-ए-हयात – ज़िंदगी की लड़ाई, राज़ – भेद, गर्दिश – मुसीबत, तदबीरें – कोशिशें, नज़र – नज़रिया, बेख़ुदी – बेख़याली, तहरीरें – लिखावट, चिराग़-ए-दिल – दिल का दीपक, शोला – लपट, तक़दीरें – किस्मत, मुक़द्दर – भाग्य, आज़माएगा – परखेगा, मुसाफ़िर – यात्री, ज़ंजीरें – बेड़ियाँ, लहजे – बोलने का ढंग, अदब – तहज़ीब, तासीरें – असर, इख़लास – सच्चाई, जागीरें – मिलकियत, तजुर्बों – अनुभव, गर्दिशें – कठिनाई, मक़ता – अंतिम शेर, तस्ख़ीरें – फ़तह।
