तआर्रुफ़:
“नज़्म – नूर-ए-दुआ” इंसानी रूह की पाक तलाश और रब्ब से उसकी गहरी मुहब्बत का आइना है। इसमें दुआओं की रौशनी, सब्र की गर्माहट और मोहब्बत की नज़ाकत को अल्फ़ाज़ के ज़रिये पेश किया गया है। यह नज़्म इबादत, रहमत और इल्म की तलाश में उठे दिल के अरमानों की तर्जुमानी करती है। दर्द को सब्र में बदलने और अश्कों को रहमत का मोती बनाने की दुआ इंसान के यक़ीन को और गहरा कर देती है। इसमें हर शेर खुदा से राबिता बनाए रखने का पैग़ाम है, जहाँ इंसान ठोकरों को सज्दे में और ग़मों को मोहब्बत की मिसाल में बदल देता है। यह नज़्म रूहानी सफ़र में रोशनी का रास्ता दिखाती है।
नज़्म– नूर–ए–दुआ
जो भी ठोकर लगे, सज्दा बना दे मुझको,
हर कदम पर हो तेरा नाम—इबादत मेरी।
ग़म के साए में भी हरदम मुस्कुराता रहूँ,
दिल में महफ़ूज़ रहे तेरी मोहब्बत मेरी।
जो भी दर्द मिले, सब्र में ढल जाए वो,
हर खुशी में निखर आए शराफ़त मेरी।
मेरे अश्कों में बसा हो तेरी रहमत का नूर,
जो भी देखे, उसे मिल जाए तेरी हिदायत मेरी।
इल्म की लौ से रौशन हो मेरा हर लम्हा,
ज़ुल्मतों से लड़ सके बसीरत मेरी।
जो भी अश्क गिरें, मोती बना दे मौला,
हर सदा बन जाए अब तेरी अमानत मेरी।
ख़ुद से हारूँ न मैं, ग़म से झुकूँ भी न कभी,
सर-बलंदी की रहे अब ये आदत मेरी।
कोई मजबूर न हो, दर्द न हो, ग़म न मिले,
हर तरफ़ फैल जाए तेरी इनायत मेरी।
‘कबीर’—रोशन रहे नाम तेरी रहमत से,
हर ज़ुबाँ पर रहे अब तेरी रिवायत मेरी।
ख़ातिमा:
“नज़्म – नूर-ए-दुआ” अपने मुकम्मल अंदाज़ में इंसान की ज़िंदगी को रोशनी और रहमत से भरने वाली दुआओं का सिलसिला है। इसमें शायर ने ग़म और दर्द को सब्र से सजाने की ख़ूबसूरत तालीम दी है। यह नज़्म हमें याद दिलाती है कि हर हालात में खुदा की तरफ़ रुझान रखना ही असल कामयाबी है। मोहब्बत, रहमत, इल्म और इनायत का मिलाजुला पैग़ाम इंसान की रूह को ताज़गी बख़्शता है। इसमें ज़िक्र है कि इबादत सिर्फ़ सज्दे में नहीं बल्कि इंसान की हर नेक आदत, हर शराफ़त और हर मोहब्बत में छुपी होती है। इस तरह यह नज़्म दिलों को नूर और ज़बानों को दुआ की मिठास से भर देती है।
उर्दू अल्फ़ाज़ उनके आसान हिंदी मायने:
रूह = आत्मा, पाक = पवित्र, रब्ब = भगवान, मुहब्बत = प्रेम, दुआ = प्रार्थना, रौशनी = प्रकाश, सब्र = धैर्य, नज़ाकत = कोमलता, अल्फ़ाज़ = शब्द, रहमत = कृपा, अरमान = इच्छा, तर्जुमानी = अभिव्यक्ति, राबिता = संबंध, सज्दा = प्रणाम, ग़म = दुख, मिसाल = उदाहरण, रूहानी = आत्मिक, सफ़र = यात्रा, ठोकर = बाधा, महफ़ूज़ = सुरक्षित, हिदायत = मार्गदर्शन, इल्म = ज्ञान, ज़ुल्मत = अंधकार, बसीरत = समझ, मौला = मालिक/खुदा, सदा = आवाज़, अमानत = जिम्मेदारी/धरोहर, सर-बलंदी = गर्व/ऊँचाई, इनायत = कृपा, रिवायत = परंपरा, मुकम्मल = पूर्ण, तालीम = शिक्षा, रुझान = झुकाव, ताज़गी = नई ऊर्जा, ज़िक्र = उल्लेख, नेक = अच्छा
