अब पछताए क्या: एक ग़ज़ल

📜 ताअर्रुफ़: ग़ज़ल “अब पछताए क्या” वक़्त की अहमियत, इनसानी बेपरवाही और उन लम्हों की नाक़द्री पर एक पुर-असर नज़रिया पेश करती है। इस ग़ज़ल में शायर ने वक़्त के…