लम्हा-ए-नायाब: एक ग़ज़ल

✍️ तआर्रुफ़: “लम्हा-ए-नायाब” एक रूहानी ग़ज़ल है जो उन ख़ास पलों की दास्तान कहती है, जो चुपचाप दिल के सबसे नर्म कोनों में अपना घर बना लेते हैं। इस ग़ज़ल…

अब पछताए क्या: एक ग़ज़ल

📜 ताअर्रुफ़: ग़ज़ल “अब पछताए क्या” वक़्त की अहमियत, इनसानी बेपरवाही और उन लम्हों की नाक़द्री पर एक पुर-असर नज़रिया पेश करती है। इस ग़ज़ल में शायर ने वक़्त के…