वतन में बेनिशान साए: एक नज़्म

यह नज़्म “वतन में बेनिशान साए”, उस ग़मगीन (दुखी) हक़ीक़त (सचाई) की ग़ज़ल (कविता) है, जो किसी शख़्स (व्यक्ति) को अपने ही वतन (देश) में महसूस होने वाले तन्हाई (अकेलापन),…

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  • May 19, 2025
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राह-ए-इस्लाम: एक ग़ज़ल

यह ग़ज़ल राह-ए-इस्लाम की हक़ीक़ी तालीमात और असल मायने को बेइंतेहा खुबसूरती से पेश करती है। इसमें इंसानियत, मोहब्बत, और इंसाफ़ जैसे अहम मअानी को उभारते हुए उन कुत्सित रवैयों…

दौर-ए-फितना की दास्तान: एक ग़ज़ल

  🔷 भूमिका: “दौर-ए-फितना की दास्तान” हर दौर की एक अपनी दास्तान होती है—कुछ लफ़्ज़ों में दर्ज, कुछ ज़ख्मों में, और कुछ ख़ामोशियों में दफ़न। मगर जब ज़माना फितना (उथल-पुथल)…